Thursday, 2 February 2012

सच है

रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि भगवान दो बार हंसते है पहली बार जब डाक्टर ये कहता है - मुझे लगता है मै इस मरीज को बचा लुंगा- और दूसरी बार तब जब दो भाइयो के झगड़े मे एक भाई जमीन पर दीवार खड़ी करके कहता है ये हिस्सा आज से हमेशा के लिये मेरा हुआ- असल मे ये दोनो बाते कहने वाले की अज्ञानता की तरफ इशारा करती है- क्योकि इस अस्थाई दुनिया मे न तो कभी कोई हमेशा के लिये किसी भी वस्तु का मालिक बनता है और ना ही किसी इंसान मे किसी दूसरे इंसान को बचाने की ताकत होती है-
हम सब अपने अपने हिस्से का श्रम भर करते है इसीलिये गीता मे कहा गया है परिश्रम करो फल की चिन्ता मत करो क्योकि फल की चिन्ता श्रम मे बाधक बन जाती है - फल किसी भी इंसान के हाथ मे नही है इसलिये उसकी चिन्ता व्यर्थ है इंसान के हाथ मे कर्म करना है तो सिर्फ वो कर्म ही करे-जितनी जल्दी हमे इस बात का आभास हो जाये कि हम कितने अज्ञानी है और इसका कारण क्या है उतनी जल्दी ही हम उसे दूर कर पायेगे- तो अगली बार ऊपर लिखी दोनो बाते अगर किसी को बोलते सुनो तो उस पर यकीन करके सुखी या दुखी मत होना।

Friday, 1 July 2011

बदल गया टी वी

आज से 15 साल पहले गोविंदा करिश्मा कपूर स्टारर फिल्म खुद्दार मे एक गाना आया था जिसके बोल थे " सैक्सी सैक्सी सैक्सी मुझे लोग बोले " उस वक्त लोग अपने बच्चो को ये गाना सुनने नही देते थे क्योकि बच्चे अपने मम्मी पापा से गाना सुनने के बाद सैक्सी का मतलब पूछा करते थे लेकिन आज ऐसा नही होता आज का बच्चा सैक्सी का मतलब नही पूछता क्योकि सैक्सी का मतलब उसे पहले से ही पता है। ये सारी मेहरबानी हमारी टीवी सस्कृति की है जिसने हमारी सोच समझ सब बदल कर रख दी है। ये दशक टीवी देखने के कल्चर मे एक नया शब्द लेकर आया जिसे हम रियेलिटी शो के नाम से जानते है । रियेलिटी शो के नाम पर हमने पश्चिमी देशो से सीखा टी वी पर करोडो रूपये जीतना , शादी करना, एक ही घर मे रह कर लड़ना झगड़ना प्यार करना, बच्चो को पालना, गाने या डास का कंपटीशन करना, डेटिग करना रोमांस करना- ये सारी वो बाते है जो हर किसी की जिंदगी का हिस्सा होती है लेकिन टी वी कैमरे ने ये सारी रियल बाते हमे कुछ ऐसे दिखाई कि हमने उन्हे रियेलिटी शो का नाम दे दिया। इन सारी बातो को हम देख चुके है अब इंतजार है तो बस कुछ नया देखने का, नयी पीढी भले ही नये के रोमांच मे उछल रही हो पर पुरानी पर तो इस जाते हुए दशक का रोमांच ही ज्यादा भारी पड़ गया। आज जब बोल्ड सीन वाले शो को देर रात दिखाये जाने की बात हो रही है तो सोचना जरूरी हो जाता है कि क्या अगले दशक मे बच्चे रात के वक्त टी वी नही देखेगे या फिर एडल्ट फिल्मो की तरह एडल्ट टी वी चैनल्स का भी अपना अलग बाजार होगा। हो सकता है आपके डीटीएच सर्विस वाले आपको एडल्ट चैनल का एक अलग पैक पेश कर दे जिससे कि लोग खुद ही फैसला ले कि वो एडल्ट शो वाले चैनल देखना चाहते है या नही।

पश्चिमी देशो की देखा देखी अपने शरीर से कपडे कम करने और नकल करके खुद को बड़ा समझने का ये चलन अगले दशक भी जारी रहेगा। इस बात के संकेत इसी दशके के जाते हुए साल के आखिरी महीनो मे मिल गये जब बिग बास जैसे रियेलिटी शो मे अश्लीलता की सारी हदे पार हो गई और हमारे देश के कानून ने उस शो पर प्रतिबंध लगाने की जगह उसे समय की सीमाओ मे बांधने का फरमान जारी कर दिया ये सरकारी फरमान इस बात पर पक्की मुहर साबित हुआ कि आने वाले दशक मे ऐसे प्रसारणो को सरकारी संरक्षण भी मिलने वाला है। लिहाजा आप भी तैयार हो जाइये खुलते कपड़ो और बंद कमरे के पीछे झांकने वाले कैमरो के काले कारनामे देखने के लिये। एक रियेलिटी शो मे शादी से लेकर सुहाग रात का जो ड्रामा खेला गया वो अपने आप मे समाज की खुली सोच का सबसे बड़ा सबूत है। कभी हर छोटी बड़ी बात को हौवा समझने वाले हमारे समाज के लिये अब खुलापन कोई हैरत की वस्तु नही है। आटो रिक्शा चलाने वाले की बेटी भले ही मिनी स्कर्ट ना पहने पर वो अपने रिक्शा मे बैठने वाली लड़कियो के कम होते कपड़ो पर आश्चर्य चकित नही होता उसे पता है आज की पीढी टी वी से प्रेरित है और वो सबकुछ जो टी वी पर दिखाया जाता है उसे हम सब अच्छा ही मानते है। क्या आज से 5 साल पहले आप अंदाजा लगा सकते थे कि एक प्रेमिका अपने प्रेमी के लायलिटी टेस्ट के लिये टीवी कैमरो का सहारा लेगी- क्या कोई सोच सकता था कि शादी जैसे पवित्र बंधन मे बंधा कोई पति अपनी पत्नी के चरित्र की सच्चाई पता लगाने के लिये किसी टी वी चैनल में सपंर्क करेगा- शायद नही 5 साल पहले तक ये सब हमारे लिये हैरानी की बाते थी लेकिन आज ये सब हमारे मनोरंजन का विषय है। इमोशनल अत्याचार के नाम पर जिस तरह हम अपने रिश्तो का माखौल उड़ते टी वी पर देखते है वो वाकई हैरान कर देने वाला है लेकिन जरा सोचिये कि जो पीढी 10-12 साल की उम्र से ये सब देखकर बड़ी हो रही है वो अगले दशक मे किस तरह का टीवी देखना पसंद करेगी।


अभी कुछ ही दिन पहले मैने अखबार मे एक विज्ञापन देखा जिसमे एक टी वी चैनल के लांचिग का जिक्र था । उसमे लिखा था कि अमेरिका मे जो हाल ही मे रियेलिटी शो खत्म हुए है वो सारे शो के हिन्दी वर्जन आप इस चैनल पर देख सकते है। इशारा साफ है ये चैनल अब आपके घर मे घुस कर अमेरिकन कल्चर आपको परोसने वाले है और यही होगा इस दशक मे टी वी का बदलता चेहरा। विदेशी फिल्मे तो नब्बे के दशक मे ही हमारे सिनेमा घरो मे दिखाई देने लगी थी - उन दिनो ज्यूरासिक पार्क, स्पीड और टाइटैनिक जैसी फिल्मे हिन्दी मे डब होकर आया करती थी और अब कुछ वैसा ही होगा जब अमेरिका मे चल रहे रियेलिटी शो को हिन्दी मे डब करके हमारे गांवो शहरो मे दिखाया जायेगा। आज देश के हाई वे पर ज्यादातर मल्टीनेशनल ब्रांड्स के आउटलेट्स और फूड ज्वाइंट्स है और ये हाई वे हमारे गांवो से होकर गुजरते है और यही वजह है कि हमारे छोटे शहरो, कस्बो और गावो मे रहने वाली आबादी भी अब बड़े शहरो और मैट्रो मे रहने वाले लोगो की तरह सब कुछ देखते समझते है। डी टी एच सर्विस ने अब आपको टीवी देखने के मामले मे अपनी मर्जी का मालिक बना दिया है। आपकी खुली सोच का सम्मान हो रहा है टीवी के दर्शक को अब कोई बेवकूफ नही बना सकता यही वजह है कि जब एक चैनल सलमान खान को किसी टाइम स्लाट मे उतारता है तो उसी वक्त दूसरे चैनल को मुकाबला करने के लिये अमिताभ बच्चन का सहारा लेना पड़ता है और तीसरा खिलाड़ी कुमार अक्षय के किचन के साथ अपने करछी बेलन तैयार रखता है- ये सब किसके लिये सिर्फ पहले से जागरूक हुए दर्शको के लिये ही तो है।

नयी पीढी को बदलते टी वी कल्चर ने पहले से ज्यादा सजग, समझदार और तेज बना दिया है। आज सबसे मुश्किल काम है दर्शको को अपने चैनल से चिपका कर रखना। टीवी चैनल अपने यंहा काम करने वाले लोगो पर करोड़ो रूपये इसी बात के लिये खर्च करते है ताकि वो चैनल को लोगो के बीच लोकप्रिय बनाये रखे और इस मामले मे अब कई कंपनिया रिसर्च कर रही है । पश्चिमी देशो मे हो चुके कई प्रयोग अभी हमारे देश मे होने बाकी है ब्रिटिश शो बिग ब्रदर की तर्ज पर देसी रियेलिटी शो बिग बास शुरू होने के बाद अब अगला पड़ाव अगले दशक मे देखने को जरूर मिलेगा। आज का युवा अब नई तरह के प्रयोग करने मे किसी से पीछे नही रहना चाहता। ग्लोबलाइजेशन, इंटरनैट और कम होती काल दरो ने दूरिया कम की है और हमे वो सब सिखाया है जिनके लिये हमने अभी तक अपने दिमाग पर ताले लगा रखे थे। टी वी कल्चर मे आये बदलाव के लिये इंटरनैट का भी बड़ा योगदान है एपल टीवी इसी का सबसे बड़ा सबूत है । आज यू ट्यूब जैसी वैबसाइट्स पर विदेशो मे दिखाये जाने वाले कई नये शो उपलब्ध है और टीवी अब मनोरंजन तक ही सीमित न रहकर हमारे लाइफस्टाइल मे शामिल हो गया है। हमारे कपड़े, जूते, लुक, हेयर कट और हमारे घर मे इस्तेमाल होने वाले हर प्रोडक्ट के फैसले अब टी वी देखने के बाद ही किये जाते है। न सिर्फ हमारी जिंदगी बल्कि दुनिया की इकानमी को चलाने का भार अब टी वी के कंधो पर ही है। किस शेयर के भाव चढ रहे है कहां कब कितना इनवेस्ट करना है से लेकर मौसम और यात्रा संबधी सारी जानकारियो के लिये अब हम टी वी का ही मुंह ताकते है। हमारी हर सुबह, शाम और रात का साथी बन चुका है टी वी । कुछ लोग मजाक मे ये भी कहते है कि बिन बीवी तो कट सकती है पर बिन टीवी तो नामुमकिन है।

टी वी के बारे मे इतना जान लेने के बाद ये बताने की जरूरत नही कि जैसे टी वी आज हमारे दिल मे घर कर चुका है उसी तरह आने वाला दशक इस घर को और भी मजबूत बनाने वाला है। आने वाले दशक मे हमारे घर के अंदर टी वी के बदलते चेहरे को देखना और भी रोचक अनुभव होगा।

(ये रचना दिल्ली प्रेस मे पहले ही प्रकाशित हो चुकी है देखे गृहशोभा)

नये दशक का सिनेमा

आमिर खान के भांजे इमरान खान को बालीवुड मे आये अभी तीन साल भी ठीक से पूरे नही हुए कि उनका एक चौकाने वाला बयान सामने आ गया है उनका कहना है कि वो अब लव स्टोरी टाइप की फिल्मे नही करना चाहते। क्या आज से 10 साल पहले बालीवुड मे आने वाला कोई भी नया हीरो इस तरह का बयान दे सकता था? बिल्कुल भी नही क्योकि हमारे दिलो दिमाग मे बिना लव स्टोरी तो किसी हीरो की कल्पना ही नही हो सकती थी। लेकिन अब ये मुमकिन होता दिख रहा है। असल में इमरान का ये बयान उस दौर की तरफ एक इशारा है जब सिनेमाघरो मे लव स्टोरी वाली फिल्मे नही दिखाई जायेगी। आने वाले दशक मे अगर आप फिल्मो मे लव स्टोरी ढूंढने जाये तो हो सकता है निराश ही लौटे। इसका सबसे बड़ा सबूत है हाल ही में दबंग जैसी एक्शन फिल्म को मिली बड़ी सफलता। गोलमाल और आल द बैस्ट जैसी कामेडी फिल्मो को मिली कामयाबी। थ्री इडियेट्स, गजनी और तारे जमीन पर जैसी फिल्मो के रिकार्ड तोड़ बाक्स आफिस कलेक्शन । इन दिनो अगर लव स्टोरी बनती भी है तो लव आजकल जैसी जंहा शुरूआत ही ब्रेकअप पर दी जाने वाली पार्टी से हो रही है। आज फिल्मो मे प्यार का इस्तेमाल कुर्बान जैसी फिल्म के प्लाट को बुनने के लिये किया जाता है जंहा प्यार एक जरिया है काम करवाने का। समाज मे बदलती सोच फिल्मो के विषयो पर पूरी तरह हावी हो रही है। आज का दर्शक एक दूजे के लिये, कयामत से कयामत तक और दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे जैसी फिल्मो पर अपना वक्त और पैसा बर्बाद करके ओल्ड फैशन सिनेमा नही देखना चाहता क्योकि वो जानता है कि दुनिया अब पहले जैसी नही रही है सब बदल रहा है और अगर बदलते वक्त के साथ अपने मनोरंजन का स्तर भी नही बदला तो वो बहुत पीछे रह जायेगा।

आज एनिमेशन मे तरह तरह के प्रयोग हो रहे है जैसे अजय देवगन की फिल्म टूनपुर का सुपर हीरो- असल मे ये नयी तरह का सिनेमा है जो अगले दशक मे हमारे मल्टीप्लेक्सेस मे दिखाई देगा। शाहरुख खान की फिल्म रा-वन मे जिस तरह का स्टंट बर्लिन मे शूट किया गया वो वाकई हैरान कर देने वाला है जिसमे शाहरुख खान खुद 300 फुट की ऊंचाई से छलांग लगाते दिखने वाले है। दर्शक पहले से ज्यादा समझदार हो चुके है और फिल्मकार अच्छी तरह से जानते है कि दर्शको की जेब से पैसे निकलवाना अब कोई बच्चो का खेल नही है। अगर फिल्म को हिट करवाना है तो वाकई कुछ ऐसा करना होगा जो दर्शको को झकझोर दे। उन्हे कुछ ऐसा देना होगा जो उनके अंदर छिपे दर्द या इमोशन को बाहर निकाल दे। जैसा कि दो साल पहले आई फिल्म ए वैडनैस डे ने किया था। फिल्म मे आतंकवाद के खिलाफ छिपे लोगो के गुस्से को इस तरह से उजागर किया कि दर्शको का दिल भी हल्का हुआ और मजेदार मनोरंजन भी हो गया। करन जौहर की फिल्म कुछ कुछ होता है नब्बे के दशक मे आई थी और अब इस फिल्म का एनीमेटेड वर्जन तैयार किया जा रहा है जिसका नाम है कुची कुची होता है। ये एक नयी तरह की प्रयोग होगा जो अगले दशक मे दिखाई देगा।

एक लड़के एक लड़की की प्रेम कहानी पर फिल्म बनाना अब घिसी पिटी बात हो चुकी है जिसे नयी पीढी के लोग देखना नही चाहते। अब डेटिंग का जमाना है एक रिश्ता टूटने पर कोई आंसू नही बहाता फास्ट फूड के जमाने मे लोगो को कुछ नया अलग और जल्दी बदलने वाला चाहिये। हालीवुड मे बनने वाली अवतार जैसी फिल्मे आज फिल्म तकनीक का नया मापदंड पेश कर रही है जिसके आगे पुरानी तकनीक बोझिल लगता है। शाहरुख खान अपनी एक फिल्म मे एक खास तरीके के शाट को 32 कैमरो से शूट करने वाले है जो कि बालीवुड मे पहली बार है। आज बालीवुड फिल्मे तकनीक के मामले मे हालीवुड से आगे निकलने की फिराक मे है। हिन्दी सिनेमा का बाजार ग्लोबल हो चुका है , आज न्यूजीलैंड से लेकर कनाडा और आस्ट्रेलिया से लेकर कोरिया तक सारे देशो मे हिन्दी सिनेमा के लिये फैस्टिवल्स आयोजित हो रहे है इसलिये नयेपन और तकनीक के मामले मे कोई भी समझौता करने के लिये तैयार नही है। नये दशक मे इन्ही सब पहलुओ को ध्यान मे रखकर फिल्मे बनेगी क्योकि आज फिल्मकार जान चुके है कि उनके दर्शक नयी पीढी के वो लोग है जो हर पल दुनिया के अलग अलग कोनो मे कुछ न कुछ नया सीख रहे है और उन्हे अगर मनोरंजन देना है तो खुद को अपडेट रखना होगा। कभी फिल्मो को समाज का आइना कहा जाता था क्योकि फिल्मे समाज मे परिवर्तन लाती थी लेकिन आज स्थिति उलट गई है बदलते समाज के साथ फिल्मो को अपना तालमेल बैठाना पड़ रहा है।

(ये रचना दिल्ली प्रेस मे जनवरी 2011 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है, देखे गृहशोभा जनवरी 2011)

Friday, 10 September 2010

दबंग रिव्यू

दबंग सलमान खान के फैन्स के लिये एंटरटेनमेंट का फुल डोज है सौतेले भाईयो के बीच बचपन के झगड़े की उसी घिसी पिटी कहानी को अभिनव सिंह कश्यप ने अपने स्टाइल मे पेश किया है एवरेज एक्टिग के बावजूद फिल्म के दमदार डायलाग्स और कमाल के एक्शन सीक्वेंस की वजह से फिल्म दर्शको का मनोरंजन करने मे कामयाब रहती है। फिल्म के डायलाग्स काफी मजेदार है खास कर स्माल टाउन्स मे रहने वाले लोगो के लिये ये किसी तोहफे से कम नही है। सलमान फैन्स को ये सलमान की पिछली फिल्म वांटेड की याद दिला सकती है। सलमान की एंट्री फिल्म मे शानदार तरीके से होती है। सोनाक्षी सिन्हा को इस फिल्म मे ढूढना पड़ता है क्योकि उनके कोई खास डायलाग्स भी नही है—उन्हे शायद गानो के लिये ही साइन किया गया है। अरबाज खान की एक्टिग एवरेज है- छोटे शहरो के कल्चर को बड़ी अच्छी तरह से दिखाया गया है सलमान के पापा के रोल मे विनोद खन्ना और मम्मी के रोल मे डिंपल कपाड़िया ज्यादा असरदार नही है—फिल्म के फाइट सीन्स लोगो को बांध कर रखते है इस फिल्म मे सलमान ने जिस तरह से एक्शन किया है वैसा पहले कभी नही देखा गया—सोनू सूद गांव के विलेन के रोल मे काफी जंच रहे है लेकिन अनुपम खेर और ओम पुरी को बस सिर्फ नाम के लिये ही फिल्म मे रखा गया है।

फिल्म का आइटम सांग मुन्नी बदनाम भी लोगो को नाचने पर मजबूर कर देगा- फिल्म की सिनेमैटोग्राफी शानदार है फिल्म की एडिटिग और क्रिस्प हो सकती थी जिसे ढीला छोड दिया गया है कुछ डबल मीनिंग डायलाग्स होने की वजह से इस फिल्म को यू ए सर्टिफिकेट दिया गया है। सलमान खान अपने जिस स्टाइल के लिये मशहूर है वो आपको इस फिल्म मे देखने को मिलेगा—कुल मिलाकर ये एक फुल आन मस्ती वाली टिपिकल सलमान खान टाइप मसाला फिल्म है जिसे 5 में से 3 स्टार्स दिये जा सकते है।

Thursday, 10 June 2010

राजनीति को तीन स्टार्स

प्रकाश झा की राजनीति मे माडर्न महाभारत की सारी क्वालिटीज है...एक मजबूत स्क्रिप्ट....एंटरटेनमेंट के लिये अलग अलग तरह के किरदार और एक के बाद एक ऐसे सीक्वेंस जो आडियेंस को बांधे रखते है...

फिल्म की कहानी रनबीर कपूर और उनकी फैमिली के इर्द गिर्द घूमती है रनबीर का किरदार एक जानी मानी पालिटिकल फैमिली से ताल्लुक रखता है लेकिन उसे पालिटिक्स मे कोई दिलचस्पी नही है वो अमेरिका मे पढाई कर रहा है कुछ दिनो के लिये इंडिया आया है लेकिन अचानक कुछ ऐसा होता है कि उसे अपने भाई को पालिटिक्स मे सपोर्ट करने के लिये मजबूर होना पड़ता है वो इंडिया मे ही रूक जाता है और एक के बाद एक ऐसे सीक्वेंस पर्दे पर आते है जो फिल्म को और इंटरेस्टिग बना देते है...फिल्म मे रनबीर के दो लव ट्रैक है एक कैटरिना के साथ जो वन साइडेड है और दूसरा अमेरिकन एक्ट्रैस सारा के साथ जो टू साइडेड है..कैट और अर्जुन के बीच रिश्तो के उतार चढाव को आडियेंस काफी इंजाय करेगी.... मनोज वाजपेयी के कुछ सीन्स बहुत इम्प्रैसिव है...नाना पाटेकर अपने रोल में खूब जंचे है...फिल्म की कास्टिग और डायलाग्स ही फिल्म की जान है...

फिल्म मे पालिटीशियन्स की लैंगवैज उनके मैनेरिज्मस उनकी डेली लाइफ और उनकी लाइफ के उतार चढाव को अच्छी तरह पिक्चराइज किया गया है...फिल्म दिखाई गई ज्यादातर घटनाए वही है जिन्हे हम अक्सर न्यूज पेपर्स मे पढते है। दुर्योधन जैसे रोल मे मनोज वाजपेयी अपनी पहचान छोड जाते है साथ ही अर्जुन राम पाल को इस फिल्म का सरप्राइज पैकेज माना जा सकता है क्योकि अर्जुन को इतने दमदार तरीके से डायलाग बोलते इससे पहले कभी देखा नही गया...कैटरिना के भी कुछ डायलाग्स शुद्द हिन्दी में है...इस फिल्म के कुछ हिस्सो पर सेंसर ने कैंची चलाई है और फिल्म देखते वक्त इसका एहसास हो जाता है...


अगर आप देश के किसी भी कोने मे रहते है और पालिटीशियन्स की लाइफ को करीब से देखने मे इन्टरेस्टेड है तो ये फिल्म आप ही के लिये है...अगर आप फिल्म को गांधी परिवार से कंपेयर न करके महाभारत से कंपेयर करके देखेगे तो ज्यादा मजा आयेगा...फिल्म मे गांधी फैमिली से मिलता जुलता ज्यादा कुछ नही है....

फिल्म मे कुछ जगहो पर महाभारत टच बोरिंग भी लगता है जैसे वो डायलाग्स जो माडर्न कुंती और माडर्न कर्ण बने अजय देवगन के बीच है...इतने ड्रामाटिक है कि लोगो को हंसी आ जाती है...फिल्म मे म्यूजिक ना के बराबर ही है...कुल मिलाकर ये एक पैसा वसूल वन टाइम वाच फिल्म है जो पाच मे से तीन स्टार्स की हकदार है।

Monday, 1 February 2010

रहमान तुझे सलाम!!

फरवरी के महीने की इससे अच्छी शुरूआत हिन्दुतान के लिये और क्या हो सकती थी कि जिस अलसाई सुबह आप अपनी रजाई मे दुबके ठंड मना रहे थे उसी वक्त संगीत का जादूगर ए आर रहमान आपको अपना सिर ऊंचा करके चलने की एक और वजह दे रहा था..ए आर रहमान ने १ फरवरी की सुबह एक और इतिहास अपने नाम कर लिया...इतिहास  संगीत के नोबल पुरस्कार माने जाने वाले ग्रैमी अवार्ड्स में पहली बार नामिनेशन के साथ ही एक नही बल्कि दो दो ग्रैमी अपने नाम करने का, ये कोई रोजाना होने वाली घटना नही थी कि हिन्दुस्तानी अपने देश को इस तरह की पहचान दिलाये।

रोजा से लेकर स्लमडाग मिलियेनेर तक का सफर करने वाले रहमान ने वाकई अबतक कई बार इस बात को साबित किया है कि अगर कोई क्रियेटिव काम ओरिजनैलिटी और ईमानदारी के साथ किया जाये तो दुनिया उसे सलाम करती है।
मेरा मानना है कि ए आर रहमान की कामयाबी का राज यही है कि वो संगीत को भगवान की पूजा की तरह शुद्द मन से तैयार करते है और संगीत बनाते वक्त उनके मन के भाव बिल्कुल निस्वार्थ होते है और इसी बात का नतीजा है कि उनके हर काम के आगे लोग फिदा हो जाते है।

अगर ऐसा न होता तो बालीवुड के बाकी के कॅापी कैट्स को भी इतने ही सम्मान मिल जाते लेकिन नही मिलते क्योकि वो अपने काम को पूरी इमानदारी के साथ नही करते। मन की खोट काम मे भी खोट पैदा कर देती है।

बहरहाल हम हिन्दुस्तानी खुश है क्योकि हमे किसी दूसरे हिन्दुस्तानी ने एक बार फिर निस्वार्थ भाव  से खुश होने का मौका दिया हैष

शुक्रिया रहमान।

Sunday, 31 January 2010

बचा लो टाइगर

हम जब न होगे तो रो रो के दुनिया ढूंढेगी मेरे निशान...

हमारे नेशनल एनिमल टाइगर पर ये लाइने बिल्कुल सटीक बैठती है जो सिर्फ अब १ हजार ४ सौ ग्यारह ही बचे है अगर वक्त रहते इस नीचे जाते काउंट डाउन को कंट्रोल नही किया गया तो हालात बद से बदतर हो सकते है आज देश के सबसे नामचीन चेहरे हम सब से अपील कर रहे है कि हमसे जो हो सके हमे करना होगा कल नही आज ही क्योकि कल तो बहुत देर हो जायेगी..
ग्लोबल वार्मिग के खतरे से अभी हमने कुछ सीखना समझना शुरू किया था कि ये नया खतरा अब अचानक सामने आ गया है जरा सोचो जिन जंगली जानवरो को वक्त रहते ये टाइगर्स खा जाते है वो टाइगर ही नही रहे तो वही लोमडिया, भेडिये, लकड़बग्घे और बारहसिंहें अगर हमारे आपके गांवो मे घुसकर हमारे ही बच्चो को खाने लगे तो क्या करोगे...क्या होगा उस पर्यावरण संतुलन का जिसे बरसो से हम सबने संभाला है हमारे जंगलो से पहले पेड़ गायब हुए और अब बारी टाइगर्स की है...
समस्या गंभीर है जितनी देर मे आप ये ब्लाग पढ रहे है किसी जंगल में एक बाघ कम हो गया होगा और हमे ये कसम खानी है कि अब आज से अभी से ये फिर से कभी नही होगा..हमे अपने नेशनल एनिमल को बचाना है...और ये हम सबकी जिम्मेदारी है।

Friday, 29 January 2010

जीना सीखना होगा

दोस्तो क्या आपने आमिर खान की फिल्म थ्री ईडियेट्स देख ली है अगर नही तो जरूर देखिये इसी संडे थोड़ी सी फुर्सत निकाल कर क्योकि कुछ काम बिना फायदा देखे दिल को खुश करने के लिए भी करने चाहिये। इस फिल्म को देखने के बाद शायद ही कोई होगा जिसका जिंदगी को रोजमर्रा की तरह देखने का नजरिया  ना बदले..वाकई ये फिल्म आपको सोचने के िलये मजबूर कर
देगी कि रोजाना जो काम आप ये सोचकर करते है कि ये आपका बहुत जरूरी काम है दरअसल वो ही काम कई बार एक ऐसा फालतू काम होता है जो आपको
आपके असल मकसद से इतनी दूर ले जाता है कि आप यही भूल जाते है कि आपकी असली पहचान क्या है।

पढाई इसलिये करनी है क्योकि समाज में पढने के बाद ही अच्छी नौकरी मिलेगी, अच्छी नौकरी होगी तभी अच्छी शादी होगी फिर बच्चे होंगे फिर उन्हे भी अच्छी तालीम और सुविधाये दिलाने के लिए खूब मेहनत करके नौकरी मे तरक्की पानी होगी जिससे कि और ज्यादा पैसा आये आम तौर पर लोगो की सोच यही होती है लेकिन मेरे भाई जरा सोचो कि क्या वाकई आप अपने स्टेटस सिंबल को बनाये रखने और अपने बच्चो को पैदा करके उनको ऊची तालीम दिलाने के लिए ही पैदा हुए हो तो फिर आपमे और आपके पड़ोसी मे क्या फर्क है। बस इतना ही कि वो डाक्टरी करके यही काम करता है और आप इसी काम को अंजाम देने के लिए इंजीनियर बनकर दिन भर सिर खपाते है।

क्या वाकई यही जिंदंगी है...क्या ऐसा नही हो सकता कि कुछ काम आप ये बिना सोचे करे कि इसको करने से आपको कितना पैसा मिलेगा...मसलन मेरे लिए लिखना शौक है भले पैसा न मिले पर सुकून मिलता है उसी तरह हो सकता है आपको ये सुकून पतंग उड़ाने..मछली पकड़ने...साइकिल चलाने या फिर स्विमिंग और पेंटिग करने मे आता हो लेकिन आप उसे बेकार का या फिर खाली वक्त का काम समझ कर जिंदगी भर टालते रहते है और जब फुर्सत मिलती है तो आपके हाथ पैर या तो उस काम (शौक) को करने के लायक नही रहते या फिर आप भूल ही जाते है कि आपका वो शौक आखिर था क्या...
मतलब आप उन जरूरी काम को करते करते अपने उस मकसद उस खुशी देने वाले अपने शौक को ऐसे भुला देते है मानो वो आपका नही पड़ोसी का काम है....

पहले तो हम जीना सीखते नही फिर कहते है कि क्या जीना है ये जीना भी कोई जीना है..मेरे भाई इसीलिये आमिर खान के कैरेक्टर रैंचो की मानो जीना सीख लो नही सीखे तो पूरी जिंदगी सजा की तरह काट कर यही बोलोगे कि अब बुढापे में थकान होने लगी है थकान क्यो न हो बेकार का काम करने मे थकान ही होती है शौक का काम करने मे थकान नही होती यकीन न हो तो दो पल के लिए खुद से पूछना कि तुमको क्या पसंद है और फिर वही काम कुछ घंटे करना...मुझे यकीन है आप ८० बरस के भी क्यो न हो आपको थकान नही होगी..

इससे पहले कि जिंदगी छिन जाये हमे तुम्हे और सबको जीना सीखना होगा।

Wednesday, 27 January 2010

अरसे बाद यूं ही..

आज एक अरसे के बाद लिखने का मन हुआ तो लिखने बैठा गया...अच्छा लगा ये सोचकर कि चलो कुछ तो है जिसे मन के मुताबिक कर सकते है...मसलन लिखना, अब देखो ना एक साल तक मन नही हुआ तो नही लिखा और जब मन हुआ तो शूरू कर दिया...वक्त कब पंछी बनकर उड़ जाता है कुछ पता ही नही चलता अभी अचानक ख्याल आया कि करीब एक साल होने को आया मुंबई छोड़कर दिल्ली को अपना ठिकाना बनाये हुए...ये शहर उस शहर से काफी अलग है उतनी दौड़भाग नही है हाँ रात के वक्त मुंबई की याद कभी कभी आती है जब सूनसान सड़के दिखाई देती है क्योकि मुंबई में खाली सड़के सिर्फ शिवसेना बंद या मनसे बंद की दादागिरी के दौरान ही दिखाई देती है..इस साल सर्दी का आनंद लेने के ख्याल से अक्टूबर से ही काफी एक्साइटेड हो रहा था पर अब सर्दी से दिल भरने सा लगा है इधर कुछ दिन दिल्ली से बाहर था तो लोगो ने बताया कि काफी कोहरा पड़ रहा था लेकिन अब तो सर्दी  की जाती हुई बहार है।

ट्विटर पर अपने विचारो को लिखना अच्छा लगता है..नया ट्रैंड है इसलिए बालीवुड के सितारे भी इस पर खुल कर अपने विचार लिखते और पढते है...एक ऐसा मंच बन गया है ट्विटर जिसपर आप ये जान सकते है कि आपके चहेते सितारे और दुनिया की जानी मानी हस्तियो की सोच क्या है...वाकई पूरी दुनिया को मुठ्ठी में समेट दिया है ट्विटर जैसी सोशल नैटवर्किग या यू कहे कि ब्लाग साइट ने...लेकिन अच्छा है कही तो आप चंद शब्दो मे अपनी भड़ास निकाल सकते है। देश दुनिया की कह सकते है और इस दुनिया की ही क्यो उस दुनिया की भी कह सकते है...

उस दुनिया से याद आया अब तो आप चांद पर भी जमीन खरीद सकते है वाकई जब पहली बार मैने ये सुना तो एक बार फिर से वो बात याद आ गई कि मनुष्य की कल्पना की कोई सीमा नही है...भले चांद पर हर कोई जा न पाये लेकिन दिल बहलाने के लिये चांद का एक टुकड़ा अपने नाम तो कर ही सकता है...वैसे भी हाउसिंग स्कीम्स की ऊंची उठती कीमतो के बाद अब अगर लोग अपने दिल को तसल्ली देने के लिए ही सही अगर चांद पर जमीन खरीदने लगे तो ज्यादा ताज्जुब की बात नही होनी चाहिये वैसे भी किसी भी बड़ी खोज या अविष्कार की शुरूआत तो  एक ख्याल से ही होती है तो अब आप भी सोचिये किसी नये ख्याल के बारे मे कौन जाने आपका कौनसा ख्याल किस नये अविष्कार  की वजह बन जाये ...

अल्लाह खैर!!!!!!






Wednesday, 4 February 2009

बोरिवली की आँखो देखी

पटरी पर बैठे नारा लगाते लोग और चारो तरफ हाहा कार बुधवार सुबह मुंबई के बोरिवली रेलवे स्टेशन पर कुछ ऐसा ही नजारा था वजह थी मुंबई की लाइफ लाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेन्स के अराइवल प्लेटफार्म का बार बार ऐन वक्त पर बदला जाना। मुंबई मे रोजाना करीब 60 लाख लोग अपने दफ्तर जाने के लिए लोकल ट्रेन मे सफर करते है सुबह के वक्त प्लेटफार्म पर तिल रखने भर की भी जगह नही होती और ऐसे मे जब बार बार ट्रेन के आने का प्लेटफार्म बदला जाये तो भगदड़ मचना तो तय है लोग भी कब तक इधर से उधर भागते..सुबह से चल रहा ये नाटक करीब 9 बजकर 10 मिनट पर अपने चरम पर पहुचा तो लोगो के सब्र का बाँध टूट पड़ा और कुछ लोगो ने कानून को हाथ मे लेकर पटरी पर धरना देने को ही समस्या का हल मान लिया..बस फिर क्या था धीरे धीरे पटरी पर ट्रेन की जगह आम लोग बिछे दिखाई देने लगे और मुंबई की इस लाइफ लाइन पर कुछ हजार लोगो ने अपना कब्जा जमा लिया जिसका सीधा असर पड़ा मुंबई के बाकी रेलवे स्टेशन पर लोकल ट्रेनो का इंतजार कर रहे करीब 12 लाख लोगो पर जिन्हे उनके दफ्तर पहुचाने का जिम्मा बोरिवली से चलने वाली इन्ही ट्रेनो पर था..लोग माँग करते रहे कि विरार के यात्रियो को सुविधा देने के नाम पर रेलवे प्रशासन उनसे ज्यादती कर रहा है और रेलवे विभाग इस हालत के लिए ट्रेन के सिगनल सिस्टम को जिम्मदार बताकर अपना पल्ला झाड़ता रहा।

इधर से उधर भाग दौड़ करते लोगो का गुस्सा चढती धूप के साथ साथ बढने लगा और हालात बद से बदतर होते देख कर पुलिस पर स्थिति को काबू मे लाने की जिम्मा दिया गया नतीजा धक्का मुक्की और लाठी चार्ज के तौर पर सामने आया..ये पूरा ड्रामा दोपहर के करीब पौने दो बजे तक चलता रहा इस दौरान मुंबई के वैस्टर्न सबर्बन एरिया मे ट्रेनो की आवाजाही लगभग ठप्प सी रही और लाखो लोग अपने दफ्तरो की जगह प्लेटफार्म पर ही अटके रहे..

दोपहर बाद दो बजे करीब काफी हद तक स्थिति को काबू मे लाया गया और प्लेटफार्म नंबर 1 से विरार के लिए पहली ट्रेन को रवाना कर दिया गया लेकिन तब भी हालात पूरी तरह सामान्य नही हो पाये..इस प्रदर्शन का असर मुंबई से बाहर जाने वाली गाडियो पर भी साफ दिखाई दिया जो बोरिवली स्टेशन से होकर गुजरती है..

बहरहाल इतनी हाहाकार के बावजूद अभी तक रेलवे प्रशासन ने ऐसी कोई घोषणा नही की है जिससे इस बात का कोई संकेत मिले कि बुधवार जैसी स्थिति दोबारा पेश नही आयेगी लेकिन फिर भी हमेशा चलते रहने का जज़्बा रखने वाला मुंबई शहर चल रहा है इसी उम्मीद के साथ कि अब फिर कभी उसकी रफ्तार से ऐसी कोई रूकावट नही आयेगी।

वैसे मैं तो हालात का जायजा लेने बतौर पत्रकार बोरिवली स्टेशन पर था मुझे नही मालुम मेरा क्या कसूर था लेकिन बदकिस्मती से वंहा मौजूद लोगो को मेरा चेहरा शायद किसी नेता से मिलता जुलता लगा और बेचारो ने कोई न मिला तो मुझ पर ही अपना गुस्सा उतार दिया॥बेचारा जी हाँ ऐसे लोगो के लिए मेरे पास यही शब्द है।