वैसे तो फुर्सत मुश्किल से मिलती है पर इन दिनो तो फुर्सत की कोई कमी नहीं इसलिये सारी कसर निकाली जा रही है...
Friday, 10 September 2010
दबंग रिव्यू
फिल्म का आइटम सांग मुन्नी बदनाम भी लोगो को नाचने पर मजबूर कर देगा- फिल्म की सिनेमैटोग्राफी शानदार है फिल्म की एडिटिग और क्रिस्प हो सकती थी जिसे ढीला छोड दिया गया है कुछ डबल मीनिंग डायलाग्स होने की वजह से इस फिल्म को यू ए सर्टिफिकेट दिया गया है। सलमान खान अपने जिस स्टाइल के लिये मशहूर है वो आपको इस फिल्म मे देखने को मिलेगा—कुल मिलाकर ये एक फुल आन मस्ती वाली टिपिकल सलमान खान टाइप मसाला फिल्म है जिसे 5 में से 3 स्टार्स दिये जा सकते है।
Thursday, 10 June 2010
राजनीति को तीन स्टार्स
फिल्म की कहानी रनबीर कपूर और उनकी फैमिली के इर्द गिर्द घूमती है रनबीर का किरदार एक जानी मानी पालिटिकल फैमिली से ताल्लुक रखता है लेकिन उसे पालिटिक्स मे कोई दिलचस्पी नही है वो अमेरिका मे पढाई कर रहा है कुछ दिनो के लिये इंडिया आया है लेकिन अचानक कुछ ऐसा होता है कि उसे अपने भाई को पालिटिक्स मे सपोर्ट करने के लिये मजबूर होना पड़ता है वो इंडिया मे ही रूक जाता है और एक के बाद एक ऐसे सीक्वेंस पर्दे पर आते है जो फिल्म को और इंटरेस्टिग बना देते है...फिल्म मे रनबीर के दो लव ट्रैक है एक कैटरिना के साथ जो वन साइडेड है और दूसरा अमेरिकन एक्ट्रैस सारा के साथ जो टू साइडेड है..कैट और अर्जुन के बीच रिश्तो के उतार चढाव को आडियेंस काफी इंजाय करेगी.... मनोज वाजपेयी के कुछ सीन्स बहुत इम्प्रैसिव है...नाना पाटेकर अपने रोल में खूब जंचे है...फिल्म की कास्टिग और डायलाग्स ही फिल्म की जान है...
फिल्म मे पालिटीशियन्स की लैंगवैज उनके मैनेरिज्मस उनकी डेली लाइफ और उनकी लाइफ के उतार चढाव को अच्छी तरह पिक्चराइज किया गया है...फिल्म दिखाई गई ज्यादातर घटनाए वही है जिन्हे हम अक्सर न्यूज पेपर्स मे पढते है। दुर्योधन जैसे रोल मे मनोज वाजपेयी अपनी पहचान छोड जाते है साथ ही अर्जुन राम पाल को इस फिल्म का सरप्राइज पैकेज माना जा सकता है क्योकि अर्जुन को इतने दमदार तरीके से डायलाग बोलते इससे पहले कभी देखा नही गया...कैटरिना के भी कुछ डायलाग्स शुद्द हिन्दी में है...इस फिल्म के कुछ हिस्सो पर सेंसर ने कैंची चलाई है और फिल्म देखते वक्त इसका एहसास हो जाता है...
अगर आप देश के किसी भी कोने मे रहते है और पालिटीशियन्स की लाइफ को करीब से देखने मे इन्टरेस्टेड है तो ये फिल्म आप ही के लिये है...अगर आप फिल्म को गांधी परिवार से कंपेयर न करके महाभारत से कंपेयर करके देखेगे तो ज्यादा मजा आयेगा...फिल्म मे गांधी फैमिली से मिलता जुलता ज्यादा कुछ नही है....
फिल्म मे कुछ जगहो पर महाभारत टच बोरिंग भी लगता है जैसे वो डायलाग्स जो माडर्न कुंती और माडर्न कर्ण बने अजय देवगन के बीच है...इतने ड्रामाटिक है कि लोगो को हंसी आ जाती है...फिल्म मे म्यूजिक ना के बराबर ही है...कुल मिलाकर ये एक पैसा वसूल वन टाइम वाच फिल्म है जो पाच मे से तीन स्टार्स की हकदार है।
Monday, 1 February 2010
रहमान तुझे सलाम!!
रोजा से लेकर स्लमडाग मिलियेनेर तक का सफर करने वाले रहमान ने वाकई अबतक कई बार इस बात को साबित किया है कि अगर कोई क्रियेटिव काम ओरिजनैलिटी और ईमानदारी के साथ किया जाये तो दुनिया उसे सलाम करती है।
मेरा मानना है कि ए आर रहमान की कामयाबी का राज यही है कि वो संगीत को भगवान की पूजा की तरह शुद्द मन से तैयार करते है और संगीत बनाते वक्त उनके मन के भाव बिल्कुल निस्वार्थ होते है और इसी बात का नतीजा है कि उनके हर काम के आगे लोग फिदा हो जाते है।
अगर ऐसा न होता तो बालीवुड के बाकी के कॅापी कैट्स को भी इतने ही सम्मान मिल जाते लेकिन नही मिलते क्योकि वो अपने काम को पूरी इमानदारी के साथ नही करते। मन की खोट काम मे भी खोट पैदा कर देती है।
बहरहाल हम हिन्दुस्तानी खुश है क्योकि हमे किसी दूसरे हिन्दुस्तानी ने एक बार फिर निस्वार्थ भाव से खुश होने का मौका दिया हैष
शुक्रिया रहमान।
Sunday, 31 January 2010
बचा लो टाइगर
Friday, 29 January 2010
जीना सीखना होगा
देगी कि रोजाना जो काम आप ये सोचकर करते है कि ये आपका बहुत जरूरी काम है दरअसल वो ही काम कई बार एक ऐसा फालतू काम होता है जो आपको
आपके असल मकसद से इतनी दूर ले जाता है कि आप यही भूल जाते है कि आपकी असली पहचान क्या है।
Wednesday, 27 January 2010
अरसे बाद यूं ही..
Wednesday, 4 February 2009
बोरिवली की आँखो देखी
पटरी पर बैठे नारा लगाते लोग और चारो तरफ हाहा कार बुधवार सुबह मुंबई के बोरिवली रेलवे स्टेशन पर कुछ ऐसा ही नजारा था वजह थी मुंबई की लाइफ लाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेन्स के अराइवल प्लेटफार्म का बार बार ऐन वक्त पर बदला जाना। मुंबई मे रोजाना करीब 60 लाख लोग अपने दफ्तर जाने के लिए लोकल ट्रेन मे सफर करते है सुबह के वक्त प्लेटफार्म पर तिल रखने भर की भी जगह नही होती और ऐसे मे जब बार बार ट्रेन के आने का प्लेटफार्म बदला जाये तो भगदड़ मचना तो तय है लोग भी कब तक इधर से उधर भागते..सुबह से चल रहा ये नाटक करीब 9 बजकर 10 मिनट पर अपने चरम पर पहुचा तो लोगो के सब्र का बाँध टूट पड़ा और कुछ लोगो ने कानून को हाथ मे लेकर पटरी पर धरना देने को ही समस्या का हल मान लिया..बस फिर क्या था धीरे धीरे पटरी पर ट्रेन की जगह आम लोग बिछे दिखाई देने लगे और मुंबई की इस लाइफ लाइन पर कुछ हजार लोगो ने अपना कब्जा जमा लिया जिसका सीधा असर पड़ा मुंबई के बाकी रेलवे स्टेशन पर लोकल ट्रेनो का इंतजार कर रहे करीब 12 लाख लोगो पर जिन्हे उनके दफ्तर पहुचाने का जिम्मा बोरिवली से चलने वाली इन्ही ट्रेनो पर था..लोग माँग करते रहे कि विरार के यात्रियो को सुविधा देने के नाम पर रेलवे प्रशासन उनसे ज्यादती कर रहा है और रेलवे विभाग इस हालत के लिए ट्रेन के सिगनल सिस्टम को जिम्मदार बताकर अपना पल्ला झाड़ता रहा।
इधर से उधर भाग दौड़ करते लोगो का गुस्सा चढती धूप के साथ साथ बढने लगा और हालात बद से बदतर होते देख कर पुलिस पर स्थिति को काबू मे लाने की जिम्मा दिया गया नतीजा धक्का मुक्की और लाठी चार्ज के तौर पर सामने आया..ये पूरा ड्रामा दोपहर के करीब पौने दो बजे तक चलता रहा इस दौरान मुंबई के वैस्टर्न सबर्बन एरिया मे ट्रेनो की आवाजाही लगभग ठप्प सी रही और लाखो लोग अपने दफ्तरो की जगह प्लेटफार्म पर ही अटके रहे..
दोपहर बाद दो बजे करीब काफी हद तक स्थिति को काबू मे लाया गया और प्लेटफार्म नंबर 1 से विरार के लिए पहली ट्रेन को रवाना कर दिया गया लेकिन तब भी हालात पूरी तरह सामान्य नही हो पाये..इस प्रदर्शन का असर मुंबई से बाहर जाने वाली गाडियो पर भी साफ दिखाई दिया जो बोरिवली स्टेशन से होकर गुजरती है..
बहरहाल इतनी हाहाकार के बावजूद अभी तक रेलवे प्रशासन ने ऐसी कोई घोषणा नही की है जिससे इस बात का कोई संकेत मिले कि बुधवार जैसी स्थिति दोबारा पेश नही आयेगी लेकिन फिर भी हमेशा चलते रहने का जज़्बा रखने वाला मुंबई शहर चल रहा है इसी उम्मीद के साथ कि अब फिर कभी उसकी रफ्तार से ऐसी कोई रूकावट नही आयेगी।
वैसे मैं तो हालात का जायजा लेने बतौर पत्रकार बोरिवली स्टेशन पर था मुझे नही मालुम मेरा क्या कसूर था लेकिन बदकिस्मती से वंहा मौजूद लोगो को मेरा चेहरा शायद किसी नेता से मिलता जुलता लगा और बेचारो ने कोई न मिला तो मुझ पर ही अपना गुस्सा उतार दिया॥बेचारा जी हाँ ऐसे लोगो के लिए मेरे पास यही शब्द है।
Wednesday, 28 January 2009
फितरत ही कुछ और है...
क्योकि हम भारतीय है हमारे लिए गरीबी वो सच है जो सच तो है पर उसे हम ढाल के तौर पर ही इस्तेमाल करना जानते है वही तो हमारा सबसे बड़ा हथियार है जहा चाहा उसका फायदा उठा लिया तभी तो आजादी के ६० साल बाद भी हमने इसे दूर नही होने दिया और दूर होने दिया होता तो क्या फिर स्लमडाग जैसी फिल्म बन पाती मतलब क्रेडिट लेने के लिए तो हम है ही गाली भी हम ही देगे करेगे कुछ नही क्योकि हमे करना तो वैसे भी कुछ है नही हाँ जो करना है वो तो कर ही रहे है अब तो आप समझ ही गये होगे कि असल में हम कहना क्या चाहते है..
Tuesday, 6 January 2009
ये जग मिथ्या...
Monday, 29 September 2008
भूलने की भूल
-
जो लोग दो अक्टूबर को गाँधी जयंती मनाने वाले है उनमे से शायद किसी के लिए भी आज यानि २९ सिंतबर का दिन कोई खास मायने नहीं रखता- और रखे भी क्यों...
-
पहले कहीं पढा था कि मनुष्य सौन्दर्योपासक (सुंदरता की पूजा करने वाला) प्राणी है मतलब सुन्दरता की पूजा करता है जो भी अच्छा लगे सुन्दर लग...

