Monday, 1 February 2010

रहमान तुझे सलाम!!

फरवरी के महीने की इससे अच्छी शुरूआत हिन्दुतान के लिये और क्या हो सकती थी कि जिस अलसाई सुबह आप अपनी रजाई मे दुबके ठंड मना रहे थे उसी वक्त संगीत का जादूगर ए आर रहमान आपको अपना सिर ऊंचा करके चलने की एक और वजह दे रहा था..ए आर रहमान ने १ फरवरी की सुबह एक और इतिहास अपने नाम कर लिया...इतिहास  संगीत के नोबल पुरस्कार माने जाने वाले ग्रैमी अवार्ड्स में पहली बार नामिनेशन के साथ ही एक नही बल्कि दो दो ग्रैमी अपने नाम करने का, ये कोई रोजाना होने वाली घटना नही थी कि हिन्दुस्तानी अपने देश को इस तरह की पहचान दिलाये।

रोजा से लेकर स्लमडाग मिलियेनेर तक का सफर करने वाले रहमान ने वाकई अबतक कई बार इस बात को साबित किया है कि अगर कोई क्रियेटिव काम ओरिजनैलिटी और ईमानदारी के साथ किया जाये तो दुनिया उसे सलाम करती है।
मेरा मानना है कि ए आर रहमान की कामयाबी का राज यही है कि वो संगीत को भगवान की पूजा की तरह शुद्द मन से तैयार करते है और संगीत बनाते वक्त उनके मन के भाव बिल्कुल निस्वार्थ होते है और इसी बात का नतीजा है कि उनके हर काम के आगे लोग फिदा हो जाते है।

अगर ऐसा न होता तो बालीवुड के बाकी के कॅापी कैट्स को भी इतने ही सम्मान मिल जाते लेकिन नही मिलते क्योकि वो अपने काम को पूरी इमानदारी के साथ नही करते। मन की खोट काम मे भी खोट पैदा कर देती है।

बहरहाल हम हिन्दुस्तानी खुश है क्योकि हमे किसी दूसरे हिन्दुस्तानी ने एक बार फिर निस्वार्थ भाव  से खुश होने का मौका दिया हैष

शुक्रिया रहमान।

Sunday, 31 January 2010

बचा लो टाइगर

हम जब न होगे तो रो रो के दुनिया ढूंढेगी मेरे निशान...

हमारे नेशनल एनिमल टाइगर पर ये लाइने बिल्कुल सटीक बैठती है जो सिर्फ अब १ हजार ४ सौ ग्यारह ही बचे है अगर वक्त रहते इस नीचे जाते काउंट डाउन को कंट्रोल नही किया गया तो हालात बद से बदतर हो सकते है आज देश के सबसे नामचीन चेहरे हम सब से अपील कर रहे है कि हमसे जो हो सके हमे करना होगा कल नही आज ही क्योकि कल तो बहुत देर हो जायेगी..
ग्लोबल वार्मिग के खतरे से अभी हमने कुछ सीखना समझना शुरू किया था कि ये नया खतरा अब अचानक सामने आ गया है जरा सोचो जिन जंगली जानवरो को वक्त रहते ये टाइगर्स खा जाते है वो टाइगर ही नही रहे तो वही लोमडिया, भेडिये, लकड़बग्घे और बारहसिंहें अगर हमारे आपके गांवो मे घुसकर हमारे ही बच्चो को खाने लगे तो क्या करोगे...क्या होगा उस पर्यावरण संतुलन का जिसे बरसो से हम सबने संभाला है हमारे जंगलो से पहले पेड़ गायब हुए और अब बारी टाइगर्स की है...
समस्या गंभीर है जितनी देर मे आप ये ब्लाग पढ रहे है किसी जंगल में एक बाघ कम हो गया होगा और हमे ये कसम खानी है कि अब आज से अभी से ये फिर से कभी नही होगा..हमे अपने नेशनल एनिमल को बचाना है...और ये हम सबकी जिम्मेदारी है।

Friday, 29 January 2010

जीना सीखना होगा

दोस्तो क्या आपने आमिर खान की फिल्म थ्री ईडियेट्स देख ली है अगर नही तो जरूर देखिये इसी संडे थोड़ी सी फुर्सत निकाल कर क्योकि कुछ काम बिना फायदा देखे दिल को खुश करने के लिए भी करने चाहिये। इस फिल्म को देखने के बाद शायद ही कोई होगा जिसका जिंदगी को रोजमर्रा की तरह देखने का नजरिया  ना बदले..वाकई ये फिल्म आपको सोचने के िलये मजबूर कर
देगी कि रोजाना जो काम आप ये सोचकर करते है कि ये आपका बहुत जरूरी काम है दरअसल वो ही काम कई बार एक ऐसा फालतू काम होता है जो आपको
आपके असल मकसद से इतनी दूर ले जाता है कि आप यही भूल जाते है कि आपकी असली पहचान क्या है।

पढाई इसलिये करनी है क्योकि समाज में पढने के बाद ही अच्छी नौकरी मिलेगी, अच्छी नौकरी होगी तभी अच्छी शादी होगी फिर बच्चे होंगे फिर उन्हे भी अच्छी तालीम और सुविधाये दिलाने के लिए खूब मेहनत करके नौकरी मे तरक्की पानी होगी जिससे कि और ज्यादा पैसा आये आम तौर पर लोगो की सोच यही होती है लेकिन मेरे भाई जरा सोचो कि क्या वाकई आप अपने स्टेटस सिंबल को बनाये रखने और अपने बच्चो को पैदा करके उनको ऊची तालीम दिलाने के लिए ही पैदा हुए हो तो फिर आपमे और आपके पड़ोसी मे क्या फर्क है। बस इतना ही कि वो डाक्टरी करके यही काम करता है और आप इसी काम को अंजाम देने के लिए इंजीनियर बनकर दिन भर सिर खपाते है।

क्या वाकई यही जिंदंगी है...क्या ऐसा नही हो सकता कि कुछ काम आप ये बिना सोचे करे कि इसको करने से आपको कितना पैसा मिलेगा...मसलन मेरे लिए लिखना शौक है भले पैसा न मिले पर सुकून मिलता है उसी तरह हो सकता है आपको ये सुकून पतंग उड़ाने..मछली पकड़ने...साइकिल चलाने या फिर स्विमिंग और पेंटिग करने मे आता हो लेकिन आप उसे बेकार का या फिर खाली वक्त का काम समझ कर जिंदगी भर टालते रहते है और जब फुर्सत मिलती है तो आपके हाथ पैर या तो उस काम (शौक) को करने के लायक नही रहते या फिर आप भूल ही जाते है कि आपका वो शौक आखिर था क्या...
मतलब आप उन जरूरी काम को करते करते अपने उस मकसद उस खुशी देने वाले अपने शौक को ऐसे भुला देते है मानो वो आपका नही पड़ोसी का काम है....

पहले तो हम जीना सीखते नही फिर कहते है कि क्या जीना है ये जीना भी कोई जीना है..मेरे भाई इसीलिये आमिर खान के कैरेक्टर रैंचो की मानो जीना सीख लो नही सीखे तो पूरी जिंदगी सजा की तरह काट कर यही बोलोगे कि अब बुढापे में थकान होने लगी है थकान क्यो न हो बेकार का काम करने मे थकान ही होती है शौक का काम करने मे थकान नही होती यकीन न हो तो दो पल के लिए खुद से पूछना कि तुमको क्या पसंद है और फिर वही काम कुछ घंटे करना...मुझे यकीन है आप ८० बरस के भी क्यो न हो आपको थकान नही होगी..

इससे पहले कि जिंदगी छिन जाये हमे तुम्हे और सबको जीना सीखना होगा।

Wednesday, 27 January 2010

अरसे बाद यूं ही..

आज एक अरसे के बाद लिखने का मन हुआ तो लिखने बैठा गया...अच्छा लगा ये सोचकर कि चलो कुछ तो है जिसे मन के मुताबिक कर सकते है...मसलन लिखना, अब देखो ना एक साल तक मन नही हुआ तो नही लिखा और जब मन हुआ तो शूरू कर दिया...वक्त कब पंछी बनकर उड़ जाता है कुछ पता ही नही चलता अभी अचानक ख्याल आया कि करीब एक साल होने को आया मुंबई छोड़कर दिल्ली को अपना ठिकाना बनाये हुए...ये शहर उस शहर से काफी अलग है उतनी दौड़भाग नही है हाँ रात के वक्त मुंबई की याद कभी कभी आती है जब सूनसान सड़के दिखाई देती है क्योकि मुंबई में खाली सड़के सिर्फ शिवसेना बंद या मनसे बंद की दादागिरी के दौरान ही दिखाई देती है..इस साल सर्दी का आनंद लेने के ख्याल से अक्टूबर से ही काफी एक्साइटेड हो रहा था पर अब सर्दी से दिल भरने सा लगा है इधर कुछ दिन दिल्ली से बाहर था तो लोगो ने बताया कि काफी कोहरा पड़ रहा था लेकिन अब तो सर्दी  की जाती हुई बहार है।

ट्विटर पर अपने विचारो को लिखना अच्छा लगता है..नया ट्रैंड है इसलिए बालीवुड के सितारे भी इस पर खुल कर अपने विचार लिखते और पढते है...एक ऐसा मंच बन गया है ट्विटर जिसपर आप ये जान सकते है कि आपके चहेते सितारे और दुनिया की जानी मानी हस्तियो की सोच क्या है...वाकई पूरी दुनिया को मुठ्ठी में समेट दिया है ट्विटर जैसी सोशल नैटवर्किग या यू कहे कि ब्लाग साइट ने...लेकिन अच्छा है कही तो आप चंद शब्दो मे अपनी भड़ास निकाल सकते है। देश दुनिया की कह सकते है और इस दुनिया की ही क्यो उस दुनिया की भी कह सकते है...

उस दुनिया से याद आया अब तो आप चांद पर भी जमीन खरीद सकते है वाकई जब पहली बार मैने ये सुना तो एक बार फिर से वो बात याद आ गई कि मनुष्य की कल्पना की कोई सीमा नही है...भले चांद पर हर कोई जा न पाये लेकिन दिल बहलाने के लिये चांद का एक टुकड़ा अपने नाम तो कर ही सकता है...वैसे भी हाउसिंग स्कीम्स की ऊंची उठती कीमतो के बाद अब अगर लोग अपने दिल को तसल्ली देने के लिए ही सही अगर चांद पर जमीन खरीदने लगे तो ज्यादा ताज्जुब की बात नही होनी चाहिये वैसे भी किसी भी बड़ी खोज या अविष्कार की शुरूआत तो  एक ख्याल से ही होती है तो अब आप भी सोचिये किसी नये ख्याल के बारे मे कौन जाने आपका कौनसा ख्याल किस नये अविष्कार  की वजह बन जाये ...

अल्लाह खैर!!!!!!






Wednesday, 4 February 2009

बोरिवली की आँखो देखी

पटरी पर बैठे नारा लगाते लोग और चारो तरफ हाहा कार बुधवार सुबह मुंबई के बोरिवली रेलवे स्टेशन पर कुछ ऐसा ही नजारा था वजह थी मुंबई की लाइफ लाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेन्स के अराइवल प्लेटफार्म का बार बार ऐन वक्त पर बदला जाना। मुंबई मे रोजाना करीब 60 लाख लोग अपने दफ्तर जाने के लिए लोकल ट्रेन मे सफर करते है सुबह के वक्त प्लेटफार्म पर तिल रखने भर की भी जगह नही होती और ऐसे मे जब बार बार ट्रेन के आने का प्लेटफार्म बदला जाये तो भगदड़ मचना तो तय है लोग भी कब तक इधर से उधर भागते..सुबह से चल रहा ये नाटक करीब 9 बजकर 10 मिनट पर अपने चरम पर पहुचा तो लोगो के सब्र का बाँध टूट पड़ा और कुछ लोगो ने कानून को हाथ मे लेकर पटरी पर धरना देने को ही समस्या का हल मान लिया..बस फिर क्या था धीरे धीरे पटरी पर ट्रेन की जगह आम लोग बिछे दिखाई देने लगे और मुंबई की इस लाइफ लाइन पर कुछ हजार लोगो ने अपना कब्जा जमा लिया जिसका सीधा असर पड़ा मुंबई के बाकी रेलवे स्टेशन पर लोकल ट्रेनो का इंतजार कर रहे करीब 12 लाख लोगो पर जिन्हे उनके दफ्तर पहुचाने का जिम्मा बोरिवली से चलने वाली इन्ही ट्रेनो पर था..लोग माँग करते रहे कि विरार के यात्रियो को सुविधा देने के नाम पर रेलवे प्रशासन उनसे ज्यादती कर रहा है और रेलवे विभाग इस हालत के लिए ट्रेन के सिगनल सिस्टम को जिम्मदार बताकर अपना पल्ला झाड़ता रहा।

इधर से उधर भाग दौड़ करते लोगो का गुस्सा चढती धूप के साथ साथ बढने लगा और हालात बद से बदतर होते देख कर पुलिस पर स्थिति को काबू मे लाने की जिम्मा दिया गया नतीजा धक्का मुक्की और लाठी चार्ज के तौर पर सामने आया..ये पूरा ड्रामा दोपहर के करीब पौने दो बजे तक चलता रहा इस दौरान मुंबई के वैस्टर्न सबर्बन एरिया मे ट्रेनो की आवाजाही लगभग ठप्प सी रही और लाखो लोग अपने दफ्तरो की जगह प्लेटफार्म पर ही अटके रहे..

दोपहर बाद दो बजे करीब काफी हद तक स्थिति को काबू मे लाया गया और प्लेटफार्म नंबर 1 से विरार के लिए पहली ट्रेन को रवाना कर दिया गया लेकिन तब भी हालात पूरी तरह सामान्य नही हो पाये..इस प्रदर्शन का असर मुंबई से बाहर जाने वाली गाडियो पर भी साफ दिखाई दिया जो बोरिवली स्टेशन से होकर गुजरती है..

बहरहाल इतनी हाहाकार के बावजूद अभी तक रेलवे प्रशासन ने ऐसी कोई घोषणा नही की है जिससे इस बात का कोई संकेत मिले कि बुधवार जैसी स्थिति दोबारा पेश नही आयेगी लेकिन फिर भी हमेशा चलते रहने का जज़्बा रखने वाला मुंबई शहर चल रहा है इसी उम्मीद के साथ कि अब फिर कभी उसकी रफ्तार से ऐसी कोई रूकावट नही आयेगी।

वैसे मैं तो हालात का जायजा लेने बतौर पत्रकार बोरिवली स्टेशन पर था मुझे नही मालुम मेरा क्या कसूर था लेकिन बदकिस्मती से वंहा मौजूद लोगो को मेरा चेहरा शायद किसी नेता से मिलता जुलता लगा और बेचारो ने कोई न मिला तो मुझ पर ही अपना गुस्सा उतार दिया॥बेचारा जी हाँ ऐसे लोगो के लिए मेरे पास यही शब्द है।

Wednesday, 28 January 2009

फितरत ही कुछ और है...

हम भारतीय भी कमाल है मानो ठान लिया है कि खुश तो हमे होना ही नही तो क्या कि इस वक्त की सबसे लोकप्रिय चर्चित और सबसे ज्यादा सराही जाने वाली फिल्म स्लम डाग मिलियेनर मे कई भारतीय कलाकारो ने काम किया है तो क्या उन्हे पूरी दुनिया मे फिर से एक नयी वजह से पहचान मिल रही है उससे भी क्या, लेकिन हमारे लिये तो ग्लास अभी भी आधा खाली ही है हम तो रोना रोने के लिए ही इस दुनिया मे आये है हमे तो शिकायत करना ही आता है हमारे देश की गरीबी क्यो दिखा दी हमे आइना क्यो दिखाया हमारे उस सच को पर्दे पर क्यो दिखाया जिससे हम रोज रूबरू होते है हम तो उस फिल्म को गाली ही देगे हम तो बुरा ही मानेगे हमे तो खुश होना ही नही है क्योकि हमे तो सिर्फ दूसरे पर आरोप लगाने ही आते है संसद से लेकर अखबारो तक और गली के नुक्कड़ से लेकर टीवी स्टूडियो तक जब तक हम किसी को किसी भी बात पर जमकर गरिया नही लेते हमारा तो खाना ही नही पचता इसलिए हम तो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक पक्ष की खोज में ही रहते है जिसे अच्छा सोचना हो सोचे हमारी तो फितरत ही कुछ और है।

क्योकि हम भारतीय है हमारे लिए गरीबी वो सच है जो सच तो है पर उसे हम ढाल के तौर पर ही इस्तेमाल करना जानते है वही तो हमारा सबसे बड़ा हथियार है जहा चाहा उसका फायदा उठा लिया तभी तो आजादी के ६० साल बाद भी हमने इसे दूर नही होने दिया और दूर होने दिया होता तो क्या फिर स्लमडाग जैसी फिल्म बन पाती मतलब क्रेडिट लेने के लिए तो हम है ही गाली भी हम ही देगे करेगे कुछ नही क्योकि हमे करना तो वैसे भी कुछ है नही हाँ जो करना है वो तो कर ही रहे है अब तो आप समझ ही गये होगे कि असल में हम कहना क्या चाहते है..

Tuesday, 6 January 2009

ये जग मिथ्या...

पिछले दिनो किसी से मुलाकात हुई बातो का सिलसिला निकला तो जिक्र आध्यात्म और भगवान तक पहुच गया...सामने वाले ने तर्क ये रखा कि हम सब किसी की कल्पना है मतलब जिसको हम भगवान मानते है उसी भगवान की हम सब एक इमेजिनेशन है.....इसीलिए कहा भी जाता है कि ये जग मिथ्या है... लेकिन सवाल वाकई गंभीर है कि क्या वाकई ये एक मिथ्या है या मिथ्या का भी भ्रम है ये दुनिया... अगर ये असलियत नही तो फिर असलियत क्या है और अगर असलियत यही है तो हम इसे मिथ्या क्यो कहते है...सवाल भले ही मुर्गी पहले आई या अंडा पहले वाला सा लगे लेकिन दिमाग को घुमाने वाला है जरूर कि बिना किसी डोर के उस ऊपर वाले ने हम सबको कठपुतली बना कर रखा है...हमे लगता है हम जो चाहे सो कर सकते है लेकिन जनाब कई बार आप जो करने चलते है उससे भी अच्छा हो जाता है और कई बार जो करना चाहते है लाख कोशिशो के बावजूद भी नही कर पाते तो फिर इसकी सफाई कौन देगा...

Monday, 29 September 2008

भूलने की भूल

जो लोग दो अक्टूबर को गाँधी जयंती मनाने वाले है उनमे से शायद किसी के लिए भी आज यानि २९ सिंतबर का दिन कोई खास मायने नहीं रखता- और रखे भी क्यों आज किसी महात्मा गाँधी का जन्मदिन तो है नहीं जो लोगो को सरकारी छुट्टी मिले- ये दिन उनके लिए किसी भी दूसरे आम दिन की तरह ही होगा- लेकिन दुख की बात तो ये है कि आज के दिन भी देश की आजादी के लिए हंसते हंसते फांसी पर चढ़ने वाले उस शहीद का जन्मदिन है जिसे हम सब शहीद भगत सिंह के नाम से जानते है- अब इसे देश की बदकिस्मती कहें या भगत सिंह की, कि लोगो को उनके जन्मदिन को याद रखने की कभी कोई जरूरत ही महसूस नहीं हुई- इस बारे में इतना लिखना ही काफी है- आगे इस बारे में कुछ लिखनें का साहस मुझमें नहीं है क्योकि आजाद भारत के जो लोग भगत सिंह को भूलनें की भूल कर सकते हैं वो कुछ भी कर सकते है और उनसे कुछ भी कहना व्यर्थ है।

अच्छे होने का हक

अरे नहीं, ये तो इंडिया हो ही नहीं सकता... कुछ यही शब्द मेरे मुंह से उस वक्त निकले जब मैं डिस्कवरी पर इंडिया के ईस्टर्न स्टेट्स पर बनी एक डॉक्यूमैंट्री देख रहा था- अब इसे यशराज की फिल्मो का असर कहे या हमारी गुलाम मानसिकता- कोई भी अच्छी सीनरी हमें भारतीय नहीं लगती।
सालो साल से ये बात हमारे भीतर घर कर चुकी है कि जो भी अच्छा है वो इंडिया का नहीं हो सकता और ये बात कोई पूरी तरह गलत भी नहीं है लेकिन हद इस बात की है कि अगर सौ में नब्बे चीजे खराब हैं भी तो बाकी बची दस चीजो के अच्छे होने का हक हम खुद ही उनसे छीन लेते है।
कुछ ऐसा ही इस देश के मुसलमानो के साथ होने लगा है- देश के करोड़ो मुसलमानो में से एक अब्दुल हमीद को तो हमने भुला दिया है जो पाकिस्तान के खिलाफ जंग में देश पर शहीद होकर अपना नाम रोशन कर गये अब हमे याद है वो सारे टैरेरिस्ट जो कभी मजहब के नाम पर तो कभी काश्मीर के नाम पर आतंक फैलाते रहते है- और इस चक्की में पिसते हैं वो जो बेचारे वाकई शरीफ मुसलमान हैं और एक जिम्मेदार नागरिक भी।
मुसलमानो के लिए हमारे बदलते रवैये ने बाकी बचे शरीफ मुसलमानो के आत्मविश्वास को भी बुरी तरह चोट पहंचाई है- किसी को बार बार चोर कहकर शायद हम ही उसे कहीं न कहीं चोरी करने को उकसाते हैं।
यही बात मुझे २९ सिंतबर के हिंदुस्तान टाइम्स की हैडलाइन ब्लैकलिस्टेड देखने के बाद महसूस हुई- जिसमें कहा गया है कि जब से दक्षिण दिल्ली के महरौली इलाके मे टिफिन बम ब्लास्ट हुआ है उस इलाके के आसपास जाकिर नगर, गफ्फार मार्केट और अबु फजल एन्कलेव में रहने वाले मुसलमानो से नये इंटरनैट कनेक्शन लेने, पिज़ा की होम डिलीवरी लेने जैसे कई हक मानो जबरन ही छीन लिये गये है- माना कि देश में होने वाले ज्यादातर टैरेरिस्ट अटैक मुस्लिम धर्म के नाम पर किये जाते है लेकिन सिर्फ ये बात बार बार कहकर आप सारे मुसलमानो को गाली तो नहीं दे सकते- ये तो 'करे कोई भरे कोई' वाली बात हुई- हाँ गुस्सा करना जायज है लेकिन कोई किसी को इस तरह से धर्म के नाम पर बेइज्जत करे ये तो किसी धर्म में नहीं सिखाया गया।
ये इस देश में मुस्लिम होने का ही खौफ है कि मेरे कई मुस्लिम दोस्त ऐसे हैं जिनके घरवालो ने उनके पहले नाम ऐसे रखे हैं जिससे उनके हिंदु होने का एहसास हो- ये ठीक वैसा है जैसा कि कभी काश्मीर मे हुआ था वंहा मैं किसी शख्स को जानता हूं जो अपना नाम लिखते है पंडित अब्दुल समद- ये मिक्सचर वाला नाम उनके घरवालों के डर की उपज था - अब नाम तो नाम है पड़ गया सो पड़ गया और ऐसा पड़ा कि अपने पीछे इतिहास की कहानी बयां कर गया-
सवाल ये है कि हमें ये हक किसने दिया कि हम किसी से उसके अच्छे होने का हक छीन ले- किसी का भाई अगर चोर है तो हम उस बिनाह पर उसे भी चोर तो नहीं ठहरा सकते- बजाय इसके कि हम चोर के बेगुनाह भाई को चोर चोर कहकर गुनाह के दलदल में धकेल दे क्या उससे कही अच्छा ये न होगा कि हम उसे ये एहसास दिलाये कि उसका भाई चोर है तो क्या पर हमें उस पर पूरा भरोसा है- यकीन मानिये कहीं न कहीं आपका ये भरोसा पाकर वो अपने चोर भाई को भी गुनाह की दलदल से इस बात का यकीन देकर बाहर निकाल सकता है कि समाज उसे भी अच्छा होने का हक दे रहा है- वरना हमारी मानसिकता तो कहीं न कहीं उसके अच्छे होने का हक ही उससे छीन लेती है। बहुत से रास्ता भटके लोग तो सिर्फ इसी बात को सोचकर वापस नहीं आना चाहते कि लोग उन्हे पता नहीं स्वीकार करेगे भी कि नहीं- वैसे इस मामले में मोनिका बेदी एक अच्छी मिसाल साबित हुई है जिन्होने इस दुनिया से दोबारा नज़र मिलाने की हिम्मत की जो कि अपने आप में काबिले तारीफ है।
मीठे वचनो से संसार जीता जा सकता है, मुश्किल तो ये है कि कभी किसी ने इस बारे में सोचा ही नहीं।

Monday, 22 September 2008

गुबार

पिछले हफ्ते नसीरुद्दीन शाह की फिल्म ए वैडनैसडे देखी- बेहद पसंद आई- पसंद आने की वजह नसीर और अनुपम खेर की एक्टिंग से ज्यादा ये थी कि इस फिल्म ने मेरे जैसे एक आम इंसान के अंदर दबे गुबार को निकालने का मौका दिया।
ये फिल्म हर उस उस इंसान के लिए एक स्ट्रेस बस्टर साबित हुई जो आज अपने स्कूल जाते बच्चे को देखकर ये चिंता करने लगता है कि कहीं कोई उसकी स्कूल बस या क्लास के अंदर बम न रख दे- शायद आप खुद भी ऐसा कई बार सोचते होगे कि आप अगर एक दिन घर से बाहर निकले और वापस नहीं आये तो आपके घरवालो का क्या होगा- भले ही कहते न हो पर दिल मे ख्याल आया जरूर होगा- यंहा आप मेरा ब्लॉग पढ़ रहे है और उधर जो कोई आपका रिश्तेदार या दोस्त कोई फ्लाइट या ट्रेन ले रहा है उसके साथ कोई हादसा हो गया तो- ये वो ख्याल है जो जाने अनजाने हम आप जैसे आम इंसानो को आता जरूर है- फिर हम शुभ शुभ बोलो शुभ शुभ सोचो कहकर ऐसे ख्याल से खुद को दूर कर लेते है लेकिन सिर्फ ऐसा कह देने भर से आप की मुश्किल खत्म नहीं हो जाती क्योकि ये तो सच है कि आज इस धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश में आम आदमी न तो घर के बाहर सुरक्षित है और ना ही अपने घर मे महफूज है।
अरे, जिस देश की संसद तक को आतंकवादी अपना निशाना बना चुके हो उस देश के आम आदमी की जान कितनी सस्ती होगी इसका अंदाजा तो कोई भी लगा सकता है। यही वो सारी बाते हैं जिन्होने हमारे अंदर बरसो से एक गुस्से को पाला हुआ है और ये गुबार अक्सर ए वैडनसडे जैसी फिल्मे देखकर निकल जाता है। या यूं कहिये कि हम ऐसी फिल्मे देखकर एक बंद अंधेरे सिनेमाहाल के अंदर अपने अंदर के अंधेरे को निकालने की कोशिश भर कर लेते है।
वैसे हमारी किस्मत मे इससे ज्यादा कुछ है भी नहीं वो तो भला हो सेंसर बोर्ड का वरना ऐसी फिल्मों को भड़काऊ कहकर बैन लगा दिया होता तो अपने दिल का गुबार निकालने का ये मौका भी हाथ से जाता रहता।