आज एनिमेशन मे तरह तरह के प्रयोग हो रहे है जैसे अजय देवगन की फिल्म टूनपुर का सुपर हीरो- असल मे ये नयी तरह का सिनेमा है जो अगले दशक मे हमारे मल्टीप्लेक्सेस मे दिखाई देगा। शाहरुख खान की फिल्म रा-वन मे जिस तरह का स्टंट बर्लिन मे शूट किया गया वो वाकई हैरान कर देने वाला है जिसमे शाहरुख खान खुद 300 फुट की ऊंचाई से छलांग लगाते दिखने वाले है। दर्शक पहले से ज्यादा समझदार हो चुके है और फिल्मकार अच्छी तरह से जानते है कि दर्शको की जेब से पैसे निकलवाना अब कोई बच्चो का खेल नही है। अगर फिल्म को हिट करवाना है तो वाकई कुछ ऐसा करना होगा जो दर्शको को झकझोर दे। उन्हे कुछ ऐसा देना होगा जो उनके अंदर छिपे दर्द या इमोशन को बाहर निकाल दे। जैसा कि दो साल पहले आई फिल्म ए वैडनैस डे ने किया था। फिल्म मे आतंकवाद के खिलाफ छिपे लोगो के गुस्से को इस तरह से उजागर किया कि दर्शको का दिल भी हल्का हुआ और मजेदार मनोरंजन भी हो गया। करन जौहर की फिल्म कुछ कुछ होता है नब्बे के दशक मे आई थी और अब इस फिल्म का एनीमेटेड वर्जन तैयार किया जा रहा है जिसका नाम है कुची कुची होता है। ये एक नयी तरह की प्रयोग होगा जो अगले दशक मे दिखाई देगा।
एक लड़के एक लड़की की प्रेम कहानी पर फिल्म बनाना अब घिसी पिटी बात हो चुकी है जिसे नयी पीढी के लोग देखना नही चाहते। अब डेटिंग का जमाना है एक रिश्ता टूटने पर कोई आंसू नही बहाता फास्ट फूड के जमाने मे लोगो को कुछ नया अलग और जल्दी बदलने वाला चाहिये। हालीवुड मे बनने वाली अवतार जैसी फिल्मे आज फिल्म तकनीक का नया मापदंड पेश कर रही है जिसके आगे पुरानी तकनीक बोझिल लगता है। शाहरुख खान अपनी एक फिल्म मे एक खास तरीके के शाट को 32 कैमरो से शूट करने वाले है जो कि बालीवुड मे पहली बार है। आज बालीवुड फिल्मे तकनीक के मामले मे हालीवुड से आगे निकलने की फिराक मे है। हिन्दी सिनेमा का बाजार ग्लोबल हो चुका है , आज न्यूजीलैंड से लेकर कनाडा और आस्ट्रेलिया से लेकर कोरिया तक सारे देशो मे हिन्दी सिनेमा के लिये फैस्टिवल्स आयोजित हो रहे है इसलिये नयेपन और तकनीक के मामले मे कोई भी समझौता करने के लिये तैयार नही है। नये दशक मे इन्ही सब पहलुओ को ध्यान मे रखकर फिल्मे बनेगी क्योकि आज फिल्मकार जान चुके है कि उनके दर्शक नयी पीढी के वो लोग है जो हर पल दुनिया के अलग अलग कोनो मे कुछ न कुछ नया सीख रहे है और उन्हे अगर मनोरंजन देना है तो खुद को अपडेट रखना होगा। कभी फिल्मो को समाज का आइना कहा जाता था क्योकि फिल्मे समाज मे परिवर्तन लाती थी लेकिन आज स्थिति उलट गई है बदलते समाज के साथ फिल्मो को अपना तालमेल बैठाना पड़ रहा है।
(ये रचना दिल्ली प्रेस मे जनवरी 2011 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है, देखे गृहशोभा जनवरी 2011)


